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शंखनाद

सुनो धनंजय, उठो फाल्गुन, बढ़ो ए मेरे पार्थ । थामो फिर से गान्डीव, त्यागो किंतु - परंतु में लिपटे यह निहितार्थ । प्रत्यंचा की टंकार से फिर अपनी, करो त्रिलोक निहाल । टोह रहे तुम्हारे देवदत्त को फिर से, यह धरती, आकाश और पाताल । आज हुआ है फिर अभिमन्यु कोई, खल बल के छल का शिकार, छल - प्रपंच के बाण पुनः हुए हैं निष्कपट सीनों के पार l चक्रव्यूह के अंतिम व्यूह में आज लिखी गई कायरता से परिपूर्ण पटकथा, कौरव गण की निर्लज्जता देख, रो रहे जल, थल, नभ भी अपनी अंतरव्यथा । सौगन्ध तुम्हें इन वीरों के पावन शव शैया की, इन शिथिल ललाटों को चूमती, इस शोकाकुल पुरवईया की । कुरुक्षेत्र का कण- कण कर रहा कौन्तेय ,तुमसे बस यहीं पुकार, अबकी जो बह निकले तो अविरल हो शत्रु रुधिर की धार । संदेशों - समझौतों की, संधि- सुलह की बीत चुकी है कबकी बेला, प्रस्थान करो इससे पहले ना पड़ जाए फिर कोई अभिमन्यु अकेला । यहाँ तुम ही स्वयं के वासुदेव हो, तुम ही स्वयं के पार्थ । खुद को दे पुनः उपदेश श्रीमद का, करो उसे चरितार्थ ।

हे आम (भाग -1)

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सौजन्य : Dailyhunt आसाढ़ की एक उमस भरी दोपहर थी, पर गंगा किनारे बैठी गाँव सबसे प्रख्यात लंठ (बदमाश) मंडली के दिमाग में कोई और ही खुराफाती बयार बह रही थी । नदी किनारे पसरी मंडली में वैसे तो कथित तौर पर कुल 7 सदस्य थे, पर मंडली का तंबू कुल जमा 4 बंबूओं पर टिका हुआ था । इनमें से पहला बंबू था सहदेव उर्फ शिकारी, महामना पेशे से बेरोज़गार थे और हुडदंगई इनका चाव था। लगातार पिछ्ले 2 सालों से 12वीं कक्षा में ही डेरा डाले हुए थे । दंत कथाओं के अनुसार यहीं लंठ मंडली के संस्थापक थे और तात्कालिक परिवेश में मंडली के अध्यक्ष पद पर आसीन थे । खाते - पीते घर से आते थे, पिता डेढ़ सौ बीघा से ज़्यादा के खेतिहर थे । घर के अगवाडे 2 ट्रैक्टर और 1 स्कॉर्पियो के अलावा घर के पीछवाडे में 12 गायें और 7 भैंसें बंधी हुईँ थीं। घर में इनके और पिताजी अलावा 2 बार ब्लॉक प्रमुख और 1 बार केन यूनियन के चुनाव में अपनी भद्द पिटवा चुके एक बड़े भाई और चूल्हा - चौका भर की दुनिया में सिमटी एक माँ थीं। घर में इनकी बातों उतनी ही अहमियत रखतीं थीं, जितनी किसी इंसानी जिस्म में अपेंडिक्स । इनके बाद बारी आती है मंडली में नंबर -...

मारा- मारी (भाग -2)

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हाँ तो मेरे प्रिय बकैतों, अब अपनी आँख खोलकर सुनो, रक्टू भाई अपने 'होते - होते रह गए' ससुराल वालों के हाथों चल रही आवभगत के कार्यक्रम से जैसे - तैसे जान छुड़ाकर भागे । सालों ने भी अपने 'सो - कॉल्ड़ जीजा जी' को ज़्यादा चोटियाना (दौड़ाना) मुनासिब नहीं समझा, इसलिए थोड़ी सी दौड़ और 'धर ससुरा के' का घोष करके के, वो भी लम्बे हो लिए । इनके जाते ही श्रोतागण भी आपस में बातें कचरते हुए तितर- बितर हो गए । थोड़ी देर स्प्रिंट लगाने के बाद रक्टू भईया को एक रिक्शा दिखाई पड़ा। ऑटो रिक्शा वाला अपने हैंडल के पास बने एक छोटे से बक्से नुमा चीज़ में से 10, 20, 50 और 100 के नोट निकालकर उनको सीधा कर, एक गड्डी में सहेजने का यत्न कर रहा था । बक्सा, जिसके उपर 'खुराक पेटिका' सफेद पेंट से पुता हुआ था । पास पहुँचकर रक्टू ने पूछा "अरे भाई, मुट्ठीगंज चलो गे ?" । "डेढ़ सौ दोगे तो काहें नई चलेंगे" रिक्शा वाला पासा फेंकने के अंदाज में बोला। डेढ़ सौ सुनकर रक्टू भन्ना गया गया और चिढ़ते हुए बोला "का डेढ़ सौ ?अबे मुट्ठीगंज जाना है, मार्स पे नहीं । साला कुल 3-4 किलोमिटर ज़्य...

मारा- मारी (भाग -1)

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बहुत अकड़ तोहरा में ?? अब देख कैसे तुझको तोड़ता हूं । जब तक तोडेगा नही, तब तक छोड़ेगा नही वाली फील लेकर रक्टू भैया उर्फ राकेश कुमार टंडन, ठाणे स्टेशन के बाहर अंगद की तरह अपने पाद जमाकर खड़े थे ( यहाँ पाद का मतलब पैर है ना की नितंब द्वारा छोड़ी जाने वाली प्राण घातक वायु ) । यह वैधानिक चेतावनी विशेषकर उन अर्धज्ञानीयों के लिए है जो आज के आज के इस 'अर्धसत्य मेव जयते' के युग में आलू का भालू बनाते देर नहीं लगाते । खैर स्टेशन के सामने की सडक से दन  - दनाती गाड़ियों और लोगों को रक्टू भाई कुछ ऐसे घूरे जा रहे थे, मानो जैसे कोई लुगाई अपनी सौत की बारात देख रही हो । पर हर सुख - दुख से अलग उनको उस मारा - मारी को चखने की ललक थी जिसके नाम की डींगें अक्सर उनका बम्बईया मित्र श्याम बिहारी हांकता था । तभी मारा- मारी के अनुपम स्वप्न में लीन रक्टू भईया को एक ज़ोर का धक्का लगता है और जैसे - तैसे खुद को संभालते हैं । तबीयत से गरियाने के उद्देश्य से, अपने वर्षों के अथक परिश्रम से तैयार की हई गालियों के शब्दकोश से माँ- बहन के सम्मान में अर्पित किए जाने वाले कुछ मधुर शब्द छाँटकर अभी पलटे ही थे, की पी...

गोधन

जब मेरी ज़िन्दगी में यह वाकया पेश आया, तब मेरी उम्र गालिबन पाँच वर्ष के से थोडी कम रही होगी । अगर अपने ज़ेहन पर थोड़ा ज़ोर डालूं , तो मेरा ज़ेहन मुझे साल 2001 के जनवरी की ओर खींचता है जब मेरे ननिहाल में मेरी मौसी की शादी की तैयारी चल रही थी । हर कोई अपने हिस्से की काम और झंझट अपने - अपने सर लिए फिर रहा था । बहरहाल खरांंवाँ - खरांंवाँ शादी का दिन पास आ रहा था और इसी क्रम में शादी से पहले हमारे यहां उत्तर प्रदेश के अवध और पूर्वांचल से लेकर बिहार के कुछ क्षेत्रों में तिलक की परंपरा है, एक प्रकार की रस्म जिसमें लड़की के पक्ष द्वारा लड़के को तिलक के शगुन के तौर पर मिठाई और अन्य वस्तुएँ भेंट की जाती हैं । तिलक की विषय में मेरा ज्ञान सिर्फ इतना ही है । बात तिलक के दिन की है, सुबह तड़के ही घर के बाहर नाते - रिश्तेदार और गाँव के लोग दरवाज़े पर जुटने शुरु हो गए थे, चाय-नाश्ते का दौर अपने उरुज़ पर था । क्योँकि तिलक लेकर काफी दूर जाना था और दिन भी सर्दियों के थे इसलिए बड़ों के चेहरे पर हड़बड़ाहट का भाव साफ उभर रहा था । एक बहुत बड़े आकार की ट्रक घर के गेट से लग कर खडी थी, जिसमें तिलक में जाने वाले मिठाई ...

अटल बाबा

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                                                       कभी सोचा नहीं था की आँखें किसी नेता के लिए नम होंगी । राजनीति को देखते - समझते लगभग 10 साल से ज्यादा बीत गए, ना जाने टीवी पर कितनी हस्तियों की शव यात्रा या उनके निधन के समाचार को देखा होगा । राजनीति की पहली स्मृति भी अटल जी से ही शुरु होती है ।  वक़्फा था मई 2004 का, देश में लोकसभा चुनाव हाल ही में खत्म हुए थे, हर तरफ नए- नवेले प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की चर्चा थी । तभी एक दिन मैने पूरी मासूमियत से अपनी दादी से पूछा "दादी अटल बिहारी वाजपेई हार गए क्या ??" दादी ने कहा "नहीं बेटा, अटल जी तो जीत गए पर उनकी पार्टी हार गई " । मैने माथे पर बल लाते हुए फिर पूछा "पर कैसे ?"। उसके बाद दादी ने लोकसभा और उसके चुनाव का गुणा- भाग मुझे आसान भाषा में समझाया ।  पर अब समय के पहिए को घुमाते हुए 16 अगस्त, 2018 की तारीख़ पर लाता हूं । 16 तारीख़ की दोपहर थी, पसीने से सना हुआ बाज़ार से लौटा । नी...