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नियति- 1

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कार ठीक - ठाक रफ्तार में सड़क पर बढ़ रही थी, क्योंकि सड़क चंडीगढ़ की थी इसलिए जाम जैसी ट्रैफिक जाम चीज़ का स्वाद यहाँ कहाँ । गाड़ी के पिछ्ली सीट पर बैठा अरविंद एक चर्च की इमारत को ऐसे निहारे जा रहा था मानो वहाँ बैठे खुदा से कोई गहरी शिकायत कर रहा हो । अरविंद ऊपरी तौर पर खुद को अपनी पारिवारिक बंधनों के चलते, बतौर आस्तिक ज़रूर पेश करता था, पर रूहानी और जज़्बाती तौर पर वो एक नास्तिक बन चुका था। शायद उसने ईश्वर को उस रात के लिए आजतक माफ नहीं किया था जब ओम का जाप करते हुए अरविंद के सामने उसके पिता चक्कर खा कर गिर पड़े थे। बहरहाल इन्हीं सब के बीच अरविंद के दाहिने हाथ नें जकड़े हुए फ़ोन पर एक वॉट्सएप्प संदेश प्रसारित होता है । संदेश ऐसे नम्बर से आया था जो अरविंद के फ़ोन में सेव नहीं था पर उस नम्बर से अरविंद अंजान हो ऐसा भी नहीं था । मैसेग में लिखा था "Hii" अरविंद ने भी जवाब में लिख दिया "Hii shreya, how are you?" । अरविंद के how are you के जवाब में श्रेया अरविंद से पूछती है : अरविंद, यार कहाँ है तू आजकल? । अरविंद श्रेया के इस मैसेग को ऊपर से ही देखकर फ़ोन को किनारे सरका ...

अनंत की ओर.........

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जब - जब नाना जी का ज़िक्र आता है, तब - तब मन पीछे की ओर चल पडता है। और चलते- चलते उसी 19 अप्रैल, 1998 की उसी धुन्धली तारीख पर पहुँच जाता है, जब नाना जी हम सब से दूर, एक अंतहीन सफ़र पर चले गए थे। ज़ेहन पर जमी धूल को थोड़ा और साफ करुँ तो आँखों के आगे एक तस्वीर उभरती है, जिसमें अप्रैल की एक गनगुनी गर्मी वाली एक सुबह, मैं खुद को एक काली बुलेट मोटरसाइकिल की टंकी पर बैठा हुआ पाता हूँ। हाथ में बुलेट की चाभी है जिसको लेकर मैं उसकी टंकी पर कुछ उकेरने की जद्दोजहद कर रहा हूँ, जैसा की 2 साल के बच्चे अमूमन करते हैं।  मेरे बाएँ हाथ की ओर एक शख्स भी है जो अपने हाथों से मुझे थामे हुए है ताकी मैं गिर ना पडूँ। कुछ देर बाद वहीं बगल में खड़ा शख्स अचानक मुझे गोद में उठा लेता है और कहने लगता है - 'बाबू नाना जी को चाभी दे दो।' इससे पहले मैं कुछ समझ पता चाभी मेरे हाथों से ली जा चुकी थी। नाना जी ने मेरे तरफ देखते हुए बाय का इशारा किया। वह सज्जन जो मुझे गोद में लिए हुए थे, उनकी आवाज़ कान में पड़ी- 'नाना जी को बाय कर दो'। इससे पहले की मैं उन्हें बाय कर पाता, नाना जी मोटरसाइकिल स्टार्ट करके ...

प्रेम प्रपंच

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आज हम बात करने वाले उत्तर प्रदेश के छोटे से लेकर बड़े शहरों , गांवों में पनपने वाली प्रेम कथाओं के बारे में । यहाँ पर प्यार भी रूस के समाज की तरह तीन हिस्सों में बंटा हुआ है । लड़के यहां प्रेम की शिक्षा अधिकतर हाईस्कूल के दिनों से प्राप्त करते है ।। इस मामले में उन लोगों को विशेष आरक्षण मिला हुआ है जिनके बड़े भाई की शादी हो चुकी है और उनके साली भी है , प्यार के क्षेत्र में साली को वरीयता दी जाती है ।। बाकी अन्य प्यार तलाशने के दो तरीके आपका कालेज या कोचिंग हो सकता है या भोलेनाथ की कृपा हो तो आपको आपके मोहल्ले में ही यह सुख प्राप्त हो सकता है जो सामान्यतः होता नही है ।        आइये अब तीनों प्रकार के प्रेम के प्रारंभ और आगे की कथा के बारे में चर्चा कर लेते है । तो सबसे पहले नंबर आता है आपके रिश्तेदारी ( अधिकतर साली से ) में होने वाले प्रेम की । इस प्रेम का प्रारम्भ बड़े भाई के रिश्ता तय होते ही हो जाता है जिसमे जब तिलक तथा शादी आदि की रस्मे निभाई जा रही होती है तब इधर इन दो दिमागों अलग खिचड़ी पक रही होती है इसमें सहयोग देती है शादी की कुछ रस्मे । उसके पश्चात घरवालों के म...

मन की बकैती वाया कबीर सिंह

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विगत कई दिनों से मन के भीतर का बेताल, कबीर सिंह देखने के लिए मचल रहा था। तो अपने भीतर के बेताल को शांत करने के लिए उसे पिक्चर का अवलोकन कराना ही पड़ा। खैर, पिक्चर देखने के बाद जैसे ही भीतर का बेताल शांत हुआ, वैसे ही अन्दर का बिक्रम ऐक्टिव हुआ और कहने लगा- बऊआ, पिच्चर तो ताड़ आए, अब कुछ लिख भी लेओ इसपे!" फिर जब कुछ इष्ट- मित्रों ने भी ललकारा, तो बात ईगो पर आ गई। तो खोला मोबाइल का नोट पैड और टचस्क्रीन पर छई - छप्पा -छई करने लगा। हालाँकि जब लिखने बैठा तो दिमाग थोड़ा नीलबटे- सन्नाटा वाली स्थिति में था, समझ नहीं आ रहा था क्या लिखा जाए? तो थोड़ा फ़ेसबुकियाना शुरु किया। फ़ेसबुक पर हवखोरी करते हुए देखा यहाँ तो जबर वाला बवाल कटा हुआ है। डेढ़- डेढ़ किलोमीटर लम्बी पोस्टें और वीडियो दिखीं, जो या तो कबीर सिंह के ज़िंदाबाद में थी या मुरर्दाबाद में। नई बात इनमें से कोई नहीं कह रहा था। लिखने वाला अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और नज़रिए के हिसाब से पिक्चर की कमी-खूबी गिनाने में लगा हुआ था। एक ओर जहाँ मेरे कुछ मित्र पिक्चर को मर्द जाती के आत्म- सम्मान से जोडते दिख रहे थे तो वहीं दूसरी ओर कुछ प्...

शंखनाद

सुनो धनंजय, उठो फाल्गुन, बढ़ो ए मेरे पार्थ । थामो फिर से गान्डीव, त्यागो किंतु - परंतु में लिपटे यह निहितार्थ । प्रत्यंचा की टंकार से फिर अपनी, करो त्रिलोक निहाल । टोह रहे तुम्हारे देवदत्त को फिर से, यह धरती, आकाश और पाताल । आज हुआ है फिर अभिमन्यु कोई, खल बल के छल का शिकार, छल - प्रपंच के बाण पुनः हुए हैं निष्कपट सीनों के पार l चक्रव्यूह के अंतिम व्यूह में आज लिखी गई कायरता से परिपूर्ण पटकथा, कौरव गण की निर्लज्जता देख, रो रहे जल, थल, नभ भी अपनी अंतरव्यथा । सौगन्ध तुम्हें इन वीरों के पावन शव शैया की, इन शिथिल ललाटों को चूमती, इस शोकाकुल पुरवईया की । कुरुक्षेत्र का कण- कण कर रहा कौन्तेय ,तुमसे बस यहीं पुकार, अबकी जो बह निकले तो अविरल हो शत्रु रुधिर की धार । संदेशों - समझौतों की, संधि- सुलह की बीत चुकी है कबकी बेला, प्रस्थान करो इससे पहले ना पड़ जाए फिर कोई अभिमन्यु अकेला । यहाँ तुम ही स्वयं के वासुदेव हो, तुम ही स्वयं के पार्थ । खुद को दे पुनः उपदेश श्रीमद का, करो उसे चरितार्थ ।

हे आम (भाग -1)

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सौजन्य : Dailyhunt आसाढ़ की एक उमस भरी दोपहर थी, पर गंगा किनारे बैठी गाँव सबसे प्रख्यात लंठ (बदमाश) मंडली के दिमाग में कोई और ही खुराफाती बयार बह रही थी । नदी किनारे पसरी मंडली में वैसे तो कथित तौर पर कुल 7 सदस्य थे, पर मंडली का तंबू कुल जमा 4 बंबूओं पर टिका हुआ था । इनमें से पहला बंबू था सहदेव उर्फ शिकारी, महामना पेशे से बेरोज़गार थे और हुडदंगई इनका चाव था। लगातार पिछ्ले 2 सालों से 12वीं कक्षा में ही डेरा डाले हुए थे । दंत कथाओं के अनुसार यहीं लंठ मंडली के संस्थापक थे और तात्कालिक परिवेश में मंडली के अध्यक्ष पद पर आसीन थे । खाते - पीते घर से आते थे, पिता डेढ़ सौ बीघा से ज़्यादा के खेतिहर थे । घर के अगवाडे 2 ट्रैक्टर और 1 स्कॉर्पियो के अलावा घर के पीछवाडे में 12 गायें और 7 भैंसें बंधी हुईँ थीं। घर में इनके और पिताजी अलावा 2 बार ब्लॉक प्रमुख और 1 बार केन यूनियन के चुनाव में अपनी भद्द पिटवा चुके एक बड़े भाई और चूल्हा - चौका भर की दुनिया में सिमटी एक माँ थीं। घर में इनकी बातों उतनी ही अहमियत रखतीं थीं, जितनी किसी इंसानी जिस्म में अपेंडिक्स । इनके बाद बारी आती है मंडली में नंबर -...

मारा- मारी (भाग -2)

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हाँ तो मेरे प्रिय बकैतों, अब अपनी आँख खोलकर सुनो, रक्टू भाई अपने 'होते - होते रह गए' ससुराल वालों के हाथों चल रही आवभगत के कार्यक्रम से जैसे - तैसे जान छुड़ाकर भागे । सालों ने भी अपने 'सो - कॉल्ड़ जीजा जी' को ज़्यादा चोटियाना (दौड़ाना) मुनासिब नहीं समझा, इसलिए थोड़ी सी दौड़ और 'धर ससुरा के' का घोष करके के, वो भी लम्बे हो लिए । इनके जाते ही श्रोतागण भी आपस में बातें कचरते हुए तितर- बितर हो गए । थोड़ी देर स्प्रिंट लगाने के बाद रक्टू भईया को एक रिक्शा दिखाई पड़ा। ऑटो रिक्शा वाला अपने हैंडल के पास बने एक छोटे से बक्से नुमा चीज़ में से 10, 20, 50 और 100 के नोट निकालकर उनको सीधा कर, एक गड्डी में सहेजने का यत्न कर रहा था । बक्सा, जिसके उपर 'खुराक पेटिका' सफेद पेंट से पुता हुआ था । पास पहुँचकर रक्टू ने पूछा "अरे भाई, मुट्ठीगंज चलो गे ?" । "डेढ़ सौ दोगे तो काहें नई चलेंगे" रिक्शा वाला पासा फेंकने के अंदाज में बोला। डेढ़ सौ सुनकर रक्टू भन्ना गया गया और चिढ़ते हुए बोला "का डेढ़ सौ ?अबे मुट्ठीगंज जाना है, मार्स पे नहीं । साला कुल 3-4 किलोमिटर ज़्य...

मारा- मारी (भाग -1)

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बहुत अकड़ तोहरा में ?? अब देख कैसे तुझको तोड़ता हूं । जब तक तोडेगा नही, तब तक छोड़ेगा नही वाली फील लेकर रक्टू भैया उर्फ राकेश कुमार टंडन, ठाणे स्टेशन के बाहर अंगद की तरह अपने पाद जमाकर खड़े थे ( यहाँ पाद का मतलब पैर है ना की नितंब द्वारा छोड़ी जाने वाली प्राण घातक वायु ) । यह वैधानिक चेतावनी विशेषकर उन अर्धज्ञानीयों के लिए है जो आज के आज के इस 'अर्धसत्य मेव जयते' के युग में आलू का भालू बनाते देर नहीं लगाते । खैर स्टेशन के सामने की सडक से दन  - दनाती गाड़ियों और लोगों को रक्टू भाई कुछ ऐसे घूरे जा रहे थे, मानो जैसे कोई लुगाई अपनी सौत की बारात देख रही हो । पर हर सुख - दुख से अलग उनको उस मारा - मारी को चखने की ललक थी जिसके नाम की डींगें अक्सर उनका बम्बईया मित्र श्याम बिहारी हांकता था । तभी मारा- मारी के अनुपम स्वप्न में लीन रक्टू भईया को एक ज़ोर का धक्का लगता है और जैसे - तैसे खुद को संभालते हैं । तबीयत से गरियाने के उद्देश्य से, अपने वर्षों के अथक परिश्रम से तैयार की हई गालियों के शब्दकोश से माँ- बहन के सम्मान में अर्पित किए जाने वाले कुछ मधुर शब्द छाँटकर अभी पलटे ही थे, की पी...

गोधन

जब मेरी ज़िन्दगी में यह वाकया पेश आया, तब मेरी उम्र गालिबन पाँच वर्ष के से थोडी कम रही होगी । अगर अपने ज़ेहन पर थोड़ा ज़ोर डालूं , तो मेरा ज़ेहन मुझे साल 2001 के जनवरी की ओर खींचता है जब मेरे ननिहाल में मेरी मौसी की शादी की तैयारी चल रही थी । हर कोई अपने हिस्से की काम और झंझट अपने - अपने सर लिए फिर रहा था । बहरहाल खरांंवाँ - खरांंवाँ शादी का दिन पास आ रहा था और इसी क्रम में शादी से पहले हमारे यहां उत्तर प्रदेश के अवध और पूर्वांचल से लेकर बिहार के कुछ क्षेत्रों में तिलक की परंपरा है, एक प्रकार की रस्म जिसमें लड़की के पक्ष द्वारा लड़के को तिलक के शगुन के तौर पर मिठाई और अन्य वस्तुएँ भेंट की जाती हैं । तिलक की विषय में मेरा ज्ञान सिर्फ इतना ही है । बात तिलक के दिन की है, सुबह तड़के ही घर के बाहर नाते - रिश्तेदार और गाँव के लोग दरवाज़े पर जुटने शुरु हो गए थे, चाय-नाश्ते का दौर अपने उरुज़ पर था । क्योँकि तिलक लेकर काफी दूर जाना था और दिन भी सर्दियों के थे इसलिए बड़ों के चेहरे पर हड़बड़ाहट का भाव साफ उभर रहा था । एक बहुत बड़े आकार की ट्रक घर के गेट से लग कर खडी थी, जिसमें तिलक में जाने वाले मिठाई ...

अटल बाबा

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                                                       कभी सोचा नहीं था की आँखें किसी नेता के लिए नम होंगी । राजनीति को देखते - समझते लगभग 10 साल से ज्यादा बीत गए, ना जाने टीवी पर कितनी हस्तियों की शव यात्रा या उनके निधन के समाचार को देखा होगा । राजनीति की पहली स्मृति भी अटल जी से ही शुरु होती है ।  वक़्फा था मई 2004 का, देश में लोकसभा चुनाव हाल ही में खत्म हुए थे, हर तरफ नए- नवेले प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की चर्चा थी । तभी एक दिन मैने पूरी मासूमियत से अपनी दादी से पूछा "दादी अटल बिहारी वाजपेई हार गए क्या ??" दादी ने कहा "नहीं बेटा, अटल जी तो जीत गए पर उनकी पार्टी हार गई " । मैने माथे पर बल लाते हुए फिर पूछा "पर कैसे ?"। उसके बाद दादी ने लोकसभा और उसके चुनाव का गुणा- भाग मुझे आसान भाषा में समझाया ।  पर अब समय के पहिए को घुमाते हुए 16 अगस्त, 2018 की तारीख़ पर लाता हूं । 16 तारीख़ की दोपहर थी, पसीने से सना हुआ बाज़ार से लौटा । नी...