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एक नज़रिया और.............

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 कथा - कैदी                                          लेखिका - अंजलि चौधरी बात आज से कुछ वर्ष पूर्व की है, जब रंगमंच शब्द से वास्तव में मेरा परिचय होना आरंभ ही हुआ था। इसी क्रम में उन दिनों मंडी हाउस के विख्यात श्री राम आर्ट सेंटर में मेरा आवागमन सहसा बढ़ गया था। उसी गति से, जिस गति से उन दिनों अवैध बूचड़खानों की तरह नए-नए यूट्यूब चैनल उपट रहे थे।  उस परिसर में इतना रम चुका था कि प्रांगण के भीतर होने वाले काल्पनिक कथाओं पर आधारित नाटक से लगाए, बाहर सड़क पर होने वाले असली तमाशे की पटकथा, संवाद सबकुछ कंठस्थ हो चुके थे। एकदिन परिसर के प्रांगण में चकल्लस झाड़ते हुए एक छोटे से हस्तनिर्मित पोस्टर पर नज़र पड़ी।  उसपर अन्ग्रेजी में एक कथन उकेरा हुआ था, जो कुछ यूँ था-  "Our demands are simple, normal, and therefore they are difficult to satisfy. All we ask is that an actor on the stage live in accordance with natural laws." इसके ठीक नीचे एक नाम लिखा था, जिसे पूरा पढ़ने हेतु मुझे ...

प्रिय कुर्सी......

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  लगभग 60-65 वर्ष की आयु का एक व्यक्ति बड़ी शान से चहलकदमी करते हुए आगे बढ़ता जा रहा है। उसके एक हाथ में 2 काले रंग की फ़ाईलें हैं और दूसरे में मोबाइल फ़ोन। बड़े ही भव्य गलियारे को पार करते हुए वह एक कमरे में प्रवेश करता है। दिखने में कमरा, गलियारे से भी भव्य था। विशाल आकार का सफ़ेद दीवारों वाला वह कमरा उजली रोशनी से नहाया हुआ था। कक्ष कीमती कलाकृतियों, चित्रों, भव्य सोफ़ा सेट,और एक विराट आकार के मेज़ से सुशोभित था। उस मेज़ कि दूसरी ओर एक सफ़ेद कुर्ता पजामा धारण किए हुए, एक 50-52 साल का चुस्त-दुरुस्त देह वाला व्यक्ति अपने फ़ोन पर कुछ टंकित करने में व्यस्त था।  उस वृद्ध के कमरे में प्रवेश करते ही उस सफ़ेद कुर्ते-पजामे वाले व्यक्ति की एकाग्रता भंग हो जाती है। वृद्ध व्यक्ति को देखते ही वह अपनी जगह से खड़ा हो जाता है और मुस्कुराते हुए कहता है- आइए सिन्हा जी, मैं सोच ही रहा था कि आप अब तक आए क्यों नहीं? (दोनों हाथ मिलाते हैं और सिन्हा जी मेज़ के इस पार लगी 2 कुर्सियों में से एक पर बैठ जाते हैं) सिन्हा जी- जी क्षमा करिए अभिनव बाबू । थोड़ी देर हो गई, असल में दयाल.... अभिनव- चलिए कोई बात नहीं। आप बत...

राम के नाम...

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  96 इस पिक्चर ने मुझे बाकी कुछ दिया हो या ना दिया हो, पर एक ऐसे प्रश्न का उत्तर अवश्य दे दिया जो मैं काफी समय से खोज रहा था। वह यह है कि जीवन में सबसे भयावह क्या होता है?  डर!  लेकिन कुछ और भी है तो इस सबसे भयावह से भी भयावह होता है। और वह है प्रेम का भय।  आप सोच रहे होंगी की यह स्थिति इसलिए भयावह होती है कि यहाँ आपको हर प्रेम भरी बोली में छल की गूँज सुनाई देने लगती है? या आशा की एक हल्की किरण से भी आपकी आँखोँ में चुभन होने लगती हैं? जी नहीं, बल्कि इसलिए होती है क्योंकि यहाँ आपको फर्क पड़ना बंद हो चुका होता है। यहाँ संवेदनशीलता और संवेदनहीनता को अलग करने वाली अच्छी भली सीमा रेखा भी मिटकर नाम मात्र की रह जाती है। और जब दोनों के बीच कोई स्पष्ट रेखा रह नहीं जाती, तो इसका घालमेल होना निश्चित हो जाता है। फिर संवेदनशीलता के उजलेपन और संवेदनहीनता के सियाहपन से तैयार होता है, एक स्लेटी रंग। धीरे-धीरे आपकी चेतना पूरी तरह इसी स्लेटी रन्ग में सनती चली जाती है। और फिर यहीं से आप वह बनते चले जाते हैं, जिससे आपको भय खाना चाहिए। क्योंकि इस स्लेटी रन्ग की परत इतनी मोटी होती है आपके ...

बेताल छब्बीसी (सोनपापड़ी विशेषांक)

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  बेताल ने अभी कूदकर विक्रम की पीठ पर अपने पैर जमाए ही थे की  विक्रम ने सेनिटाइज़र की बोतल उसके नाक के ठीक आगे लाकर टिका दी। सेनिटाइज़र की बोतल देख अनुराग से भरा बेताल ताव खा गया। भौहें सिकोड़ते हुए बोला- अब तुम भी?  विक्रम- हम भी मतलब? हाथ पर सेनिटाइज़र मलने के लिए ही तो कहें हैं? तुम तो ऐसे बऊरा रहे हो जैसे पता नहीं क्या कह दिए हों! बेताल- अरे मतलब अब हमसे सेनिटाइज़र घिसवाओगे? यार कुछ दिन तुमसे लॉकडाउन में क्या नहीं मिले, तुम्हरा तो माथे फिर गवा है! (अपने अन्तर्मन में कुछ रहस्यमयी शब्दों का उच्चारण करते हुए बेताल आखिर में चुल्लू भर सेनिटाइज़र हथेली में भरकर घिसने लगता है) विक्रम- (अपना मास्क नाक के ऊपर करते हुए) गनीमत करो की अभी हाथ पर भी घिसवा रहे हैं, नही तो अगर हमरा बस चले तो तुम्हरे ऊपर पूरा बाल्टा उलट दें! बेताल- भक्क बे! खैर छोड़ो। और बताओ दिवाली कैसी गुजरी। पड़ाका तो भडकाए नहीं होगे। बड़का कानूनची जो हो।  विक्रम- अरे ऐसा कुछ नहीं पड़ाका बजाना ही चाहें तो कौन रोक लेगा?  बेताल- सरकार तो तुम ही लोग की है! तुम्हरा वैसे भी कोई क्या उखाड लेगा? खैर छोड़ो और बताओ अम्मा का...

सच का पंचनामा

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एक समय था जब सच, मात्र सच हुआ करता था। फिर जैसे-जैसे मानव बुद्धि का विकास हुआ, वैसे- वैसे सच की भी सदगति/दुर्गती होती चली गई। सबसे पहले तो मानव ने अपनी सुविधा अनुसार आरे से रेंतकर सच के 3 टुकड़े किए। जिसमें से पहला टुकडा निकला 'मेरा सच', दूसरा निकला 'तेरा सच' और वह 'असली वाला सच,' जिसका वर्चस्व कभी पूरी मानव जाति पर हुआ करता था, वह लुढ़ककर तीसरे पायदान पर पहुँच गया। खैर, सच की सदगति/ दुर्गति का क्रम यहीं नहीं रुका। फिर सच को किसी गद्दे की भान्ति सूत-सूतकर उसपर धार्मिक लबादा चढ़ाया गया। तो अब वस्तु स्थिति यह थी की सत्य कुल जमा 6-7 वैरायटीयों में उप्लब्ध हो चुका था।  लेकिन संतुष्टी से मानव का बैर सदैव ही रहा है। फिर कुछ वक़्त बीता , तो मानव सच की उप्लब्ध वैरायटीयों से ऊबने लगा। बुद्धिजीवीयों ने सोचा की इससे पहले की लोग फिर वहीं 'असली वाला सच' माँगने लगें, उन्हें कोई नया शिगूफ़ा थमाया जाए। अतः तमाम मंत्रोच्चार के बाद टोपी से एक 'लेफ्ट वाला सच' निकाला गया। इसे कुछ लोगों ने तो हाथों हाथ लिया, मगर कुछ की इस नए झुनझुने से नहीं पटी। सो इसकी ...

टिटिहरा कहिन....

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आज सालों बाद फिर एक पुरानी पुस्तक हाथ लगी। पुस्तक थी 5वीं कक्षा के वेल्यू एजुकेशन विषय की। एक समय था जब यहीं वेल्यू एजुकेशन की पुस्तक बहुत प्रिय हुआ करती थी, पर समय बीतते ना बीतते इसी एजुकेशन की वेल्यू पर धूल की तहें जमती चली गईं। बहरहाल किताब के तमाम पन्नों से होते हुए नज़रें एक विशेष पन्ने पर जा टिकिं। नज़रें कुछ देर तक उस एक ही पन्ने पर नाचती रहीं। पन्ने पर छपे अक्षरों को पढ़कर आँखों के आगे कुछ चेहरे घूम गए। उनमें एक चेहरा था सुप्रीम कोर्ट के एक तथाकथित 'जाने-माने वकील' का। जो अब से कुछ दिन पहले ही रामायण और महाभारत को अफीम कहने की वजह से सोशल मीडिया पर जनता द्वारा चोटियाए गए थे। पर वह तो भला हो सर्वोच्च न्यायालय का, जिसने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाकर उनके संकट को हरा, नहीं तो महोदय की जेल यात्रा का टिकट लगभग कट ही चुका था। गौरतलब है की यहीं महानुभाव कई बार इसी सुप्रीम कोर्ट को मिनरल वाटर पी-पीकर कोस चुके हैं। पर चूँकि आदमी बड़े हैं, इसलिए उन्हें कई चीजों की माफी हैं। बहरहाल उस पन्ने पर छपे अक्षरों पर फिर से लौटते हैं। उस पन्ने पर छपे अक्षर पंचतन्त्र की एक प्रसिद्ध कथा क...

अतीत का दरवाज़ा by प्रत्यक्ष

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सूरज से लड़कर लौट आता हूँ घर,   अब नंगे पाँव चलने से छाले नहीं पड़ते। सच में, दर्द अब थोड़ा कम होता है, भूख और प्यास से निवाले नहीं लड़ते। गाँव की पहचान भूल चुका हूँ कब का,  गली कूचो में पूरे दिन भटकता रहता हूँ। बंद कमरे में सीलन की चादर ओढे, तारे-सा अंधेरे में सिमटता रहता हूँ ।  अलमारी के किवाड़ कभी-कभी खुलते ही नहीं,  रोशनदान ने भी खुलने से अब मना कर दिया है।  मकड़ियों के जाले उँगलियों में यूँ ही उलझ जाते हैं,  दीवार की रंगत ने ख़ुद को फ़ना कर दिया है।  किताबों के पन्ने दीमक रोज़ कुतर रहे है, लम्बी पड़ी मेज़ पर कोई चश्मे दिखते नहीं। किताबें अपनी ही कहानियों को खा रहे है,  अब ये गाँव के किसी दुकान पर बिकते नहीं। वह बंद पड़ा टीवी शायद चल जाए ठोक पीट कर, पहले की तरह वह आज भी कमरे का उजाला है।  आँखों में कितने ही ख़्वाहिशों के रंग छन जाते हो,  लोगों की तरह वो आज भी सफ़ेद और काला है।  इस घर के आँगन में तुलसी की टहनियाँ बची हैं, पूजा और पानी दिखे एक ज़माना हो गया होगा।...

Sedang Sedang Saja

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हम में से जो लोग सन् 90 के समय वाले संगीत का चाव रखते हैं, उन्हें आमिर खान की फिल्म 'मन' ज़रुर याद होगी। पिक्चर से ज़्यादा नाम इसके संगीत ने कमाया था। भले इस फिल्म को 20 वर्षों से अधिक हो चुका हो, पर आज भी उत्तर भारत के कस्बाई बाज़ारों में इसके 'काली नागिन के जैसी' हो या 'चाहा है तुझको' जैसे गीत गाहे-बगाहे सुनने को मिल जाएँगे। पर इनके गीतों के अलावा इस चलचित्र में एक गीत और भी था, जिसने उस वक़्त चौक- चौराहे से लगाए चित्रहार तक गज़ब की धूम मचाई थी। और वह गीत था- "तिनक तिन ताना, वह धून तो बजाना।" कुछ याद आया? खैर अगर नहीं आया तो एक बार इस यूट्यूब लिंक की सैर कर आइए, मोटे चेक की टी-शर्ट में झूमते आमिर खान को देखकर ज़रुर याद आ जाएगा। https://youtu.be/Y01NQiOz2nw पर गाने से भी ज़्यादा रोचक इससे जुड़ी एक बात है, जो शायद इस गाने जितनी तो लोकप्रिय नहीं है, पर रोचक उतनी ही है। बहुत कम ही लोग जानते हैं की यह गाना सन् 1997 के मलेशियाई गाने 'Sedang Sedang Saja' की नकल है और इसे गाने वाले कलाकार हैं Wan Syahman bin Wan Yunus उर्फ Iwan. ht...

कई चेहरे हैं इस दिल के...

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ग़ालिबन 2005 का शुरुआती वक़्त रहा होगा। उन दिनों अपनी ज़िंदगी का तंबू कुल जमा 4 बंबूओं पर टिका हुआ था। क्रिकेट, वीडियो गेम, कार्टून और गाने। अमूमन पहले 3 शौक, रात के पहले पहर तक निपटा लिए जाते थे और आखिरी शौक के लिए रात का दूसरा पहर खुसूसी तौर पर छंटा हुआ होता था। चूँकि उन दिनों मोबाइल फ़ोन या आई- पॉड थे नहीं, ऐसे में गाने सुनने के ज़रिए कुल जमा 2-3 ही थे। टीवी, स्टीरियो, वॉकमैन या रेडिओ। मेरा पसंदीदा ज़रिया था टीवी, जिसके चालू होते ही उंगलियाँ तेज़ी से 72 नम्बर दबाती थीं। क्योंकि उन दिनों हमारे केबल नेट्वर्क पर MTV का यहीं ठिकाना हुआ करता था। हालाँकि यह सब सुनने में जितना आसान लगता है उतना था नहीं। उन दिनों टीवी रिमोट अपने पास रखने से ज़्यादा आसान फूटबाल के मैच में गेंद अपने पास रखना था। पर उस दिन अपना मुस्तकबिल पूरे शबाब पर था। चूँकि मम्मी- पापा किसी शादी में गए थे, इसलिए उस दिन घर में हुकूमत अपनी थी। घर पर रुकने का असल मकसद तो अगले दिन होने वाले इम्तिहान की तैयारी थी, पर उस बाबत आगे कुछ ना ही कहूँ तो बेहतर है। बहरहाल टीवी चलाकर, दीवार पर गेंद मारकर उसे कैच करने लगा। जब यह खिल...
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देश की राजधानी में एक बहुत बड़े पत्रकार हैं, जो स्वयं को पत्रकारिता का स्वघोषित मानदंड मानते हैं जबकि उनके 'भक्तों' के दृष्टिकोण में वह वर्तमान समय में पत्रकारिता का प्रमाणपत्र बांटने वाली देश की सबसे बड़ी संस्था हैं। कल रात यूट्यूब पर उन्हीं का एक पुराना 'प्राइम टाईम' चलचित्र देखते हुए अचानक मुझे एक पुराने कार्टून शो का स्मरण आया। शो जिसका नाम था 'Road Runner' और जिसका प्रसारण किसी समय में Cartoon Network पर हुआ करता था। मेरा विचार है की हममें से जो 90 के दशक के निर्मित मॉडल हैं, उनमें से कुछ लोग इस कार्यक्रम से ज़रुर परिचित होंगे। और जिन्हें स्मरण करने में कठिनाई हो रही है, उनके लिए यह पहेली इस यूट्यूब लिंक के माध्यम से थोड़ा सरल किए देते हैं - 👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻 https://youtu.be/PkBu-mnXOAk पता नहीं क्यों अब जब भी इस Road Runner का उल्लेख भी होता है, तब-तब वह पत्रकार महोदय याद आते हैं। इस शो में Road Runner के पीछे दौड़ता हुआ Coyote मुझे निरंतर उन्हीं पत्रकार महोदय की झलक दिखती है। Coyote की भांति ही वह पत्रकार महोदय भी 2014 के बाद से निरंतर राष्ट्र के पोलिट...

अतीत के पन्नों से...

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कई दफ़े कोई अफ़साना या कहानी लिखते वक़्त एक ऐसा नाज़ुक दौर भी आता है, जब एक कलमकार की कलम उसके इख्तियार (काबू) से बाहर हो जाती है। गैरों के मुतलिक तो यह बात यकीन से नहीं कह सकता पर मेरे बाबत यह हक़ीक़त, कयामत जितनी ही मुनासिब है। कलम की बेवफाई अमूमन एक ही चीज़ साथ लाती हैं और वह है ख़ला (शून्य)। ख़ला, जिसकी आमद होती है अचानक किसी किरदार या फलसफे के कहानी से जुदा हो जाने पर।  बहरहाल आज से करीब 22 बसंत पहले भी एक ऐसा ही इत्तेफ़ाक़ पेश आया था, जब मेरी ही तरह एक और कलमकार की भी कलम उसे दगा दे गई थी। हम दोनों के दर्मियां का फर्क महज़ इतना ही है की, मैं अपनी कलम से हम सभी के मुक़द्दर में आ चुकी कहानियाँ लिखता हूँ और वह अपनी कलम से हम सभी के मुक़द्दर में आने वाली कहानियाँ लिखता है। मेरी बात का मुताल्लिक उसी से है, जिसने आज से सदियों पहले अपनी कलम से इस कायनात की बुनियादों को सलाखा था और जिसका एहतराम हम परवरदिगार के   तख़ल्लुस से करते हैं। खालिस अददी लहज़े में बात करुँ तो वह 19 अप्रैल, 1998 का दिन था, जब परवरदिगार से उसके कलम की बगावत हमें एक गहरी खलिश दे गई।  दुनियावी...

जुनून - भाग -1

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2006 का साल बढ़ते - बढते नवंबर तक का सफ़र तय कर चुका था। ठंड धीरे-धीरे ही सही मगर दृढ़ता से अपने आगे कदम बढा रही थी। पर माहौल की सर्गर्मी ने ठंड की रफ्तार को थोड़ा थाम सा दिया था। भले ही औरों के लिए आतंकवाद, इराक़, अमेरिका, न्यूक्लियर डील, मनमोहन सिंह, सोनिया, लेफ्ट, और कांग्रेस बहस के मुद्दे हों पर सेंट जोसेफ स्कूल के मैदान में पालथी मारे बैठे उन 4 पंछियों के लिए यह सभी बातें बेमानी थीं। उन तोतों की जान तो उसी दिन खत्म हुए अंडर-13 के सिलेक्शन ट्रायल्स के नतीजों में कैद थी, जिसके नतीजों की मुनादी अगले दिन होनी थी। यह ट्रायल्स ही इस बात को तय करने वाले थे की अगले हफ्ते से शुरु होने वाले डेनिस शील्ड टूर्नामेंट में सेंट जोसेफ स्कूल की जर्सी पहनकर खेलना किस- किस के मुक़द्दर में आएगा? यूँ तो 15 में से 12 नाम लगभग पहले से ही तय थे पर वास्तविक द्वंद सिर्फ 3 नामों को लेकर था। इन 3 नामों को लेकर कोच विजय शर्मा के मन में भीषण ऊहापोह की स्थिति थी। एक तरफ तो उनका दिमाग कह रहा है की बचे हुए 3 स्थानों पर भविष्य को ध्यान में रखकर कनिष्ठ (junior) खिलाडियों को मौका दिया जाए क्योंकि अगले साल इस अंडर- ...

LOCKDOWN DIARIES

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आज जब मैं रामायण के सेतु निर्माण वाले भाग में प्रभु श्री राम और  गिलहरी वाला प्रसंग देख रहा था, तभी अचानक मेरे मन में कथा आई, जो कुछ दिन पूर्व ही मैने 'Alchemist' में पढ़ी थी। चूंकि यह कथा मुझे निजी स्तर पर काफी प्रेरक लगी इसलिए सोचा इसे आप सभी से साझा करना चाहिए।  बात आज से सैकडों वर्षों पहले सम्राट टाइबेरियस के समय की है, जब रोम में एक वयोवृद्ध व्यक्ति रहा करता था। उसके दो पुत्र भी थे। एक सैन्य अधिकारी था तो दूसरा कवि। अपने- अपने क्षेत्रों में दोंनों की ही कीर्ति बहुत उज्ज्वल थी।   एक रात्रि उस वृद्ध व्यक्ति को एक स्वप्न आया, जिसमें एक देवदूत ने उसे दर्शन दिए। स्वप्न में उस देवदूत ने बताया की निकट भविष्य में उसके दोनों पुत्रों में से एक के कहे हुए शब्द इतनी ख्याति प्राप्त करेंगे, की आने वाली कई पीढ़ियाँ उसे दोहराएंगी।  परंतु दुर्भाग्यवश कुछ समय पश्चात एक बालक के प्राण बचाने का प्रयत्न करते हुए उस व्यक्ति की मृत्यु हो गई। चूँकि उस वृद्ध ने अपना पूरा जीवन बहुत ही धर्मपरायणता से व्यतीत किया था इसलिए उसे स्वर्ग लोक की प्राप्ति हुई। वहाँ उसकी भे...

THE WHISTLEBLOWER

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अबसे कुछ देर पहले, इंटरनेट पर Dr. Li Wenliang की कहानी पढ़ते समय पता नहीं कब मेरा दिमाग Paulo Coelho के सुप्रसिद्ध उपन्यास 'Alchemist' के एक दृश्य में जा पहुँच, जहाँ कथा के नायक Santiago का सामना एक काले नक़ाबपोश से होता है, जब वह कबीले के सरदारों को लुटेरों के होने वाले संभावित आक्रमण के बारे में आगाह करके लौट रहा होता है। सामना होने पर वह नक़ाबपोश अपनी तलवार तेज़ी से सेंटिआगो के करीब ले जाकर कहता है-  तुम होते कौन हो अल्लाह की मर्ज़ी को बदलने वाले?' लड़का संभलते हुए कहता है- अल्लाह ने ही यह जहाँ बनाया, मुझे और तुम्हें बनाया। वह अल्लाह ही है जिसने इस कायनात को, उस दुश्मन की सेना को और परिंदों के उस झुंड को ज़िंदगी दी। यहाँ तक की मेरे यहाँ होने और उस आने वाले खतरे के संकेतों को पढ़ने के पीछे भी अल्लाह की मर्ज़ी हैं। नक़ाबपोश- लेकिन फिर भी क्या तुम अल्लाह की मर्ज़ी को बदल सकते हो? लड़का- नहीं, मैनें सिर्फ शत्रु की आती हुई सेना और संभावित युद्ध को देखा ना की युद्ध के परिणाम को। और शायद अल्लाह भी चाहता है की युद्ध का परिणाम हमारे पक्ष में हो, इसलिए उसने मुझे यह संकेत दिए। क...

बातें कही - अनकही

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सुना था उम्मीद पर दुनिया चलती है, सो यहीं सुनकर मैं भी चले जा रहा है । सच कहूँ तो यह उम्मीद नाम की ईंधन बड़ी कमाल की चीज़ है पंक्चर से पंक्चर आदमी को भी अपने ज़ारिये घसीटे रखती है । लेकिन कल शाम को रही - सही उम्मीदी ईंधन भी खत्म हो गई । कल शाम तक तो इसी खुशफहमी में जी रहा था की तुमसे जुड़ी हर याद को अपने ज़ेहन से खुरच - खुरच कर मिटा चुका हूं पर कल जब अपने भीतर उतरा तो पता चला की खुरचने को अब भी बहुत कुछ बचा है । तकरीबन 24 घंटे बीत चुके है यादों की परतों खरोचते हुए पर यह कम्बख्त खत्म होने का नाम नहीं ले रहे । अब लग रहा है की इन सब को खुरच दिया तो इसके बाद मेरे भीतर बचेगा क्या ? और बचने की बात तो छोड़ ही दो आखिर क्या - क्या खुर्चूंगा ? वो दिल्ली का हीरा स्वीट्स की गली वाला फ्लैट ? वो लक्ष्मीनगर का मैट्रो स्टेशन कि बैंच ? वो जामा मस्जिद की सीढ़ियां ? वो बंगला सहीब गुरुद्वारे की परिक्रमा ? वो राजीव चौक मैट्रो स्टेशन का गेट नम्बर 7 ? कालकाजी मंदिर की उस बूढ़ी अम्मा का आशिर्वाद या शायद पूरी जवानी । दिल अब भी मानने को तैयार नही है की अब तुम से बचा - खुचा रिश्ता भी अपने अंजाम क...

~ दिल के तहखाने से

सोशल मीडिया पर यूँ ही चहलकदमी करते हुएएक तस्वीर देखी तुम्हारी। तुम्हारी गोद मे एक नन्ही सी जान। पता नही, बस यूं ही कहीं खो गया उस तस्वीर में। आखिर उस परिवार का हिस्सा बनना चाहता था मैं। मैं भी कहीं उस तस्वीर में मौजूद होना चाहता था, तुम्हारी उस चेहरे पे झिलमिलाती हुई मुस्कुराहट को सामने से महसूस करना चाहता था। पर ज़िन्दगी है और हम इंसान हैं। जीवन में कुछ ऐसे अनचाहे चौराहे आते हैं जहाँ से ज़िंदगी एक नई करवट ले ही लेती है। अपनी किसी भी परेशानी में, किसी भी हालात में वो एक फ़ोन नंबर हमेशा साथ था, जिसे बिना वक़्त देखे और सहूलियत देखे घुमा दिया करता था,आज एक मैसेज भी भेजने से पहले ख्यालों का बवंडर हिम्मत तोड़ देता है। तुम्हारे जाने के बाद, तुमसे ज्यादा खुद को ढूंढ रहा हूँ पर मगर सिवाय खालीपन के हाथ कुछ नहीं है। कुछ सरल सी चीज़ें ज़िन्दगी में आपको झकझोर के रख देती हैं और मेरे लिए वो तस्वीर कुछ वैसी ही थी। आज भी दिल मे वही प्यार, वही खुशी महूसस होती है उस परिवार के लिये पर तब जता नहीं पाया और आज जताने का वक़्त नहीं है।

भूली बिसरी बकैतीयाँ!

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जो गुज़र गया वह भी वक़्त था , जो गुज़र रहा है वह भी वक़्त है और जो गुज़र जाएगा वह भी वक़्त होगा बहरहाल अपनी साहित्यिक बकैती को विराम देकर अगर मुद्दे पे आऊं तो इतना ही कहूंगा आज से ठीक एक साल पहले हमारी बिक्रम - बेताल की जोड़ी अर्थात मैं और मेरा मित्र Garvit Katyal एक सफर पे निकले थे और आज बिक्रम - बेताल की सफरनामे की पच्चीसी का ज़िक्र करना बहुत प्रासंगिक इसलिए क्योंकि एक यह सफरनामा एक विशिष्ठ प्रकार का adventre साबित हुआ और ज़िन्दगी के चंद लल्लनटाप यादों की फेहरिस्त में शामिल हो गया ।   सफरनामे की पच्चीसी शुरुआत ही नोटबंदी रूपी ट्विस्ट से हुई क्योंकि जब तक बिक्रम - बेताल की स्टोरी में ट्विस्ट ना हो तब तक मज़ा कैसा ???? नोटबंदी से हमारी हालत किसी Deckworth - lewis नियम की मारी किसी टीम जैसी हो गयी। हालांकि deckworth - lewis नियम के बावजूद बिक्रम - बेताल की जोड़ी ने पिच पे उतर कर करने बैटिंग का फैसला लिया। तो आखिरकार निकल पड़े अपने सफरनामे पर। बस और ट्रेन मे तमाम तरह की खो - खो -- कबड्डी खेलते हुए आखिर कार अजमेर पहुंच ही गए। पहुंच कर google map पर सवार होकर अपनी मंज़िल अर्थात ख्वाजा ज...